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घुमक्कड़ों की जिन्दगी का तो कोई ठिकाना नहीं होता!

Travel Story

Travel Story : यात्राओं की अपनी कुछ दुश्वारियां होती हैं। हम जैसे घुमक्कड़ों कि जो घने जंगलों और दूरदराज पहाड़ों में घूमते हैं उनकी जिन्दगी का तो कोई ठिकाना नहीं। पिछले के पिछले साल यानि की 2016 में जब उत्तराखंड में भूकम्प आया। मैं खुले आसमान के नीचे अपने टेंट में सो रहा था। सुबह नींद खुली तो गांव के घर तबाह हो गए थे।

अभी कुछ दिनों पहले स्पीति में जब बर्फबारी शुरू हुई तो किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह आने वाली तबाही का संकेत है। लेकिन दूरदराज के लोग पापुलेटेड एरिया की तरफ बढ़ने लगे थे। आपको बता दूं कि स्पीति कोई नगर नहीं है, यह एक घाटी है जहां घर बहुत ही कम हैं। अभी भी इतने बड़े भूभाग पर निवास करने वाले लोगों की संख्या सिर्फ पैतीस हजार के आसपास है।

इस जगह पर घूमने आने वाले ज्यादातर पर्यटक ट्रैकिंग के लिए निकलते हैं और खुले आसमान के नीचे कैम्प में रहते हैं। सबको अपने जीवन की एक घूमंतु कहानी (Travel Story) लिखनी होती है।

हिमाचल प्रदेश के दो पूर्व जिलों लाहौल और स्पीति के विलय के बाद अब लाहौल और स्पीति एक ही जिला बन गया है जिसका मुख्यालय केलांग है। विलय से पहले लाहौल का मुख्यालय करदंग और स्पीति का मुख्यालय दनकर हुआ करता था। लेकिन कम आबादी और भौगोलिक संरचना के कारण प्रशासनिक कार्यों को संपादित करना मुश्किल भरा काम था। इसलिए दो कि बजाय इसे एक प्रशासनिक इकाई के अंदर कर दिया गया।

यह जगह अपनी ऊंची पर्वतमाला के कारण अभी भी शेष दुनिया से कटी हुई है। यहां पर स्थित रोहतांग दर्रा 3,978 मी की ऊंचाई पर इसको कुल्लू घाटी से अलग करता है। कुंजुम दर्रा भी यहीं पर स्थित है यह लाहौल और स्पीति को एक दूसरे से अलग करता है। जिले़ की पूर्वी सीमा तिब्बत से मिलती है, उत्तर में लद्दाख भू-भाग और दक्षिण में किन्नौर एवं कुल्लू की सीमा लगती हैं।

यह जगह दुनिया भर में अपने दुर्गम रास्तों और बदलते मौसम के कारण जानी जाती है। अत्यधिक ऊंचाई के कारण सर्दियों में यहां बहुत ठंड होती है। गर्मियों में मौसम बहुत सुहावना होता है। शीतकाल में ठंड के कारण यहां बिजली व यातायात की बेहद कमी हो जाती है जिस कारण यहां पर्यटन में भारी कमी हो जाती है।

सिल्क रूट की ट्रिप पूरी करने के साथ ही अगस्त महिने की 27 तारीख को मैं भी यही सोचकर आया था कि रास्ता बन्द होने तक दो तीन महीने यहीं रहकर अपनी किताब पूरी करुंगा। फिर रास्ता बन्द होने को होगा तो वापस दिल्ली लौट जाऊंगा। शुरू के कुछ दिनों तक मैं भी अपने टेंट में रहा पर 18 सितंबर बारिश ज्यादा होने लगी तो होमस्टे में आ गया था। यही मेरे लिए सबसे पॉजिटिव कड़ी साबित हुआ। पॉजिटिव (Travel Story) इसलिए क्योंकि हममें से ज्यादातर लोग नान-मोटरेबल जगहों पर थे।

जहां से अगर आपको किसी गांव में पहुंचना हो तो पूरा दिन लग जाता है। यही बाकि लोगों के साथ हुआ। स्थिति का आभाष होने के बावजूद भी लोग निकल नहीं पाए। शुरू में बाई रोड लोगों को बाहर निकालने की कोशिश हुई। लोगों को निकालने का काम चल ही रहा था लेकिन भारी बारिश और बर्फबारी की वजह से सड़कें तबाह हो गईं। खैर, यह एक बहुत बड़ी आफ़त थी। हमें इस बात का अंदाजा हो चुका था कि हम फंस चुके हैं।

रोहतांग दर्रा यहां की लाइफलाइन है, इसके बंद होने के साथ ही बाहरी दुनिया से हमारा कनेक्शन बिल्कुल खत्म हो गया।

जिसकी वजह से हम सब घबराये हुए थे। ऐसा लग रहा था कि अब बस जिन्दगी और मौत के बीच इंतजार बचा है। जिसके खत्म होने और नहीं होने की कोई सीमा नहीं है। खाने-पीने के लिए भी हमारे पास कुछ नहीं बचा था। एक कमरा जिसमें चार लोग भी नहीं रह सकते उसमें 20-20 लोग आ गए थे। हमारे मन में बस बार बार एक ही सवाल था कि अब हम यहां से जिन्दा निकल पाएंगे भी कि नहीं। और यह सवाल भूख और प्यास दोनों को मार देता था।

अड़तालीस घंटे तक मुझसे कुछ नहीं खाया गया। लेकिन वह कहते हैं ना कि जाको राखे साइयां मार सके ना कोई।

हारती हुई हिम्मत को सहारा उस समय मिला आसमान में जब दो हेलीकॉप्टर अचानक से उड़ते दिखाई दिए। मतलब, बाहरी लोगों को हमारी स्थिति का सही सही अंदाजा लग गया था। कुछ लोगों को बचा लिया गया, कुछ लोगों को बचाने का कार्य परस्पर चल रहा है, कुछ लोगों की जिन्दगी बीच रास्ते में ही हार गई।

मैं स्पीति में होते हुए फोन लेना अवॉइड करने लगा। जिन लोगों से बात हुई यही कहता रहा कि मैं स्पीति में नहीं हूं। और लोगों ने मेरी इस बात पर विश्वास भी कर लिया क्योंकि तमाम मरे हुए लोगों की खबरों के बीच मेरे जिन्दा होने की सबूत मेरी आवाज़ उनके कानों तक डायरेक्ट पहुंच रही थी। लेकिन सच कहूं तो मौत का डर मुझे भी था और मैं पूरी तरह से घबराया हुआ था। पर नहीं चाहता था कि मेरे अपने इस बात से घबराएं। पर घर पर बताना जरूरी था तो खबर कर दी।

बाईस घंटे बाद एयरलिफ्ट करके हेलीकॉप्टर से दस लोगों निकाला गया पर लोग संख्या में बहुत ज्यादा थे। तब तक बीआरओ के लोग इधर उधर नजर आने लगे थे। आपको बता दूं कि सीमा सड़क संगठन यानि की बीआरओ ही है जिसकी वजह से हम दुनिया भर के घुमक्कड़ यहां आने का साहस जुटा पाते हैं। उन्होंने कई जगहों पर अपने अस्थाई कैम्प लगाए और धीरे धीरे लोगों को उस कैम्प तक ले जाया गया। फिर निजी वाहनों से मनाली लाया गया तब कहीं जाकर मुझ खुदको अपने होने, बच जाने का असल अहसास हुआ।

मुझे याद नहीं कि उस अफरातफरी में मेरे एक पैर का जूता कब कहां निकल गया। लेकिन दूसरे पैर का जूता अभी भी पैर में है।

मैं, सचमुच सुरक्षित हूं। और यह अहसास जिन्दगी और जिन्दगी में आने वाली उन तमाम आफतों और दुश्वारियों से कहीं बड़ा और बेहतर है। अब मैं हंस सकता हूं, मुस्करा सकता हूं, अपनी अगली तमाम यात्रा के लिए खुदको फिर से खुशी-खुशी तैयार कर सकता हूं और उन सैकड़ों हजारों लोगों से बातें कर सकता हूं जिन्होंने मेरी फिक्र और प्रवाह की।

वह लोग जो मुझे प्यार करते हैं, वह लोग जिनके लिए मेरी एक एक मुस्कराहट क़ीमती है।

इस तरह से एक हादसा जो बहुत ही दुखद कहानी की तरह से था एक ख़ूबसूरत घूमतु कहानी (Travel Story) में बदल गया।

travel writer sanjaya shepherd लेखक परिचय

खानाबदोश जीवन जीने वाला एक घुमक्कड़ और लेखक जो मुश्किल हालातों में काम करने वाले दुनिया के श्रेष्ठ दस ट्रैवल ब्लॉगर में शामिल है। सच कहूं तो लिखने और घूमने के अलावा और कुछ आता ही नहीं। इसलिए, वर्षों से घूमने और लिखने के अलावा कुछ किया ही नहीं। बस घुम रहा हूं।